आज हम पुरानी दिल्ली गए थे
हमारी मेट्रो ट्रेन ने हमे दोपहर को वहां पहुँचाया ..
धुप में नहाई हुयी गलिया और सड़के बहुत प्यारी लग रही थी
मानो जैसे कुछ पलो के लिए वक़्त रुक सा गया हो
हमने कदम बढाया और एक भव्य मंदिर हमारे सामने..
थोडा आगे बढे थो एक आलिशान गुरुद्वारा
उसी के बगल में एक मस्जिद और फिर थोडा आगे एक गिरिजाघर.
अमा मिया यह थो सोने पे सुहागे वाली बात हो गयी
कितना ही अजीबो गरीब संगम किसने कहाँ यहाँ धर्म के नाम पे लड़ते हैं लोग
झूट बोलते हैं वह जलते हैं, बस नज़र न लगे
यही देखने आज हम पुरानी दिल्ली गए थे
यहाँ का बाज़ार भी बहुत पुराना है
यहाँ हर दुकानदार के पास एक किस्सा है और हर एक के पास लतीफा है
सबके पास नसीहत मुफ्त मिलती है और तहज़ीब तो मानो मुफ्त बटती है
हर लोई काम में लगा है दो पैसे कमाने मैं व्येस्त है
पर ना जाने क्यूँ इनकी बातो में इंसानियत है एक मासूमियत है
यही देखने आज हम पुरानी दिल्ली गए थे
कुछ पूछा कुछ खरीदा कुछ लिया कुछ देखा
कदम बड़ते गए और मौसम भी हसीन होता गया
पेट में से आवाज़ आई तो रुक कर इधर उधर देखा
ढाबे में रोटी तैयार थी, पेट भी भरा और मन भी
इसीलिए तो आज हम पुरानी दिल्ली गए थे
शाम होने लगी अब अलविदा कहना पड़ेगा
ना जाने क्यूँ, दिल रुकने को कह रहा है
गलियों में घुमने को उकसा रहा है
लोगो से मिलने को बोल रहा है
जस्बादी तो हम है नहीं फिर आज क्या हो गया
बस इसीलिए आज हम पुरानी दिल्ली गए थे
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